हे प्रभु आनंद मय मुझको यही उपहार दे!
सुबह उठते ही मुझे ताज़ा कोई अखबार दे!!
पुष्प चन्दन धुप तुलसी आप ही ले लीजिये!
हज़ार रुपये के नोट जितने हों मुझे दे दीजिये!!
आप के भंडार में धन द्रव्य की सीमा नहीं !
पर आपने मेरे लिए भेजा कोई बीमा नहीं !!
और हमारा कौन है सब कुछ हमारे आप हैं !
आप हमारे बाप के भी बाप के भी बाप हैं!!
दो आशीष पुरे मुझे दो चार सौ बरस जीता रहूँ!
ब्लैक रिश्वत की कृपा से जेब को भरता रहूँ !!
एक झंडा आठ गुंडे चार मोटर कार दे !
हे प्रभु आनंद मय मुझको यही उपहार दे!!
(एक अनाम गीतकार की यह रचना जिन्हें मैं नहीं जानता परन्तु विगत ३० वर्षों से लोगों को सुना रहा हूँ, भारत के उन तमाम सपूतों को समर्पित है जो सामाजिक, राजनीति, प्रशासनिक, न्यायिक एवं पत्रिकारिता आदि सेवाओं में योगदान करते हुए अपनी मातृभूमि का बंटाधार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं) सभी बंधुओं, भगिनियों, मित्रों आदि को सुप्रभातं !
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